हमारी कहानी
एक अधूरा सपना,
जिसे एक बेटी ने आगे बढ़ाया।
मेरे दादाजी का सपना था कि गाँव में सरसों का तेल निकालने की घाणी लगाई जाए। लेकिन दादाजी बहुत कम उम्र में हमें छोड़कर चले गए और उनका सपना अधूरा ही रह गया।
करीब 40 साल पहले मेरे पापा ने लोहे की घाणी लगाकर उस सपने को पूरा किया और सरसों का तेल निकालना शुरू किया।
पापा की मेहनत
मैंने अपना पूरा बचपन गेहूँ पीसने, मसाले कूटने और तेल निकालने वाली उन्हीं मशीनों के बीच बिताया। उस समय शुद्ध अनाज, मसाले और तेल आसानी से मिल जाते थे, इसलिए उनकी अहमियत महसूस ही नहीं होती थी।
लेकिन धीरे-धीरे समय बदला। परंपराएँ और ये छोटे कारोबार बंद होने लगे और हम तैयार सामान की ओर बढ़ते चले गए।
मेरा फैसला
“पापा, ये घाणी आप बंद नहीं करेंगे। ये वैसे ही चलेगी जैसे हमेशा से चलती आई है।”
पापा ने पूछा — “लेकिन इसे चलाएगा कौन?”
“मैं।”
पापा की एक सीख
“शुद्धता और मिलावट के बीच सिर्फ़ एक अंतर है — विश्वास का। लोगों का विश्वास कभी टूटने मत देना।”
उस दिन से ये सिर्फ़ एक कारोबार नहीं रहा। ये मेरे लिए एक जिम्मेदारी बन गया — उस विरासत को आगे बढ़ाने की, जिसे मेरे परिवार ने वर्षों से संभालकर रखा है।
आज का Mohi Pure
आज उसी परंपरा के साथ मैंने अपने गाँव और आसपास के गाँवों में बने पारंपरिक बिलोना घी को भी इस मुहिम से जोड़ा है।
मेरे लिए कोई “अमीर” या “साधारण” ग्राहक नहीं है। सभी के लिए दाम और गुणवत्ता एक समान है।
मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि अधिक से अधिक लोग शुद्धता से जुड़ें और उस भरोसे को महसूस करें, जो हमारी पीढ़ियों ने सँभाला है।
आज Mohi Pure सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं है —
ये मेरे दादाजी के सपने,
मेरे पापा की मेहनत
और मेरे अपने संकल्प की कहानी है।
“खुद को खुद से बेहतर करना।”
— रेखा सुथार
संस्थापक, Mohi Pure